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Thursday, October 8, 2009

ये वीराना ही बेहतर है मेरे दिल

दो क़दम चलता हूँ और ठहर जाता हूँ
एक आवाज़ है जो मुझे रोक लेती है

कभी क़दम बढ़ता है शहर कि तरफ
मगर तभी या ख्याल आता है
वहां भी कौन सा कोई आबाद है
उस शहर से तो ये जंगल ही शाद है
जानवर यहाँ  भी यही वहां भी
जान ये लेंगे तो मारेंगे वहां भी
यहाँ भी वहशत है, वहाँ भी
खून ओ गारत यहाँ  है, वहाँ भी
मगर यहाँ एक सब्र तो है
मारने वाला जानवर है, वहशी इंसान नहीं
ये तो फिर भी इतना लिहाज़ करता है
सामने देखकर रास्ता बदलता है
मगर वो मेरे ही रास्ते पर आता है
भाई कहकर गले भी लगाता है
और फिर चुपके से मौक़ा पाकर
मेरी पीठ में मेरे ही खंजर से
एक प्यार भरा वार लगाता  है

अब बता ऐ मेरे दिल
क्या मै घर चला जाऊँ

उस आवाज़ को अनसुना कर जाऊँ
जो मुझे शहर कि तरफ जाने से रोकती है.

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