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Thursday, October 8, 2009

ये वीराना ही बेहतर है मेरे दिल

दो क़दम चलता हूँ और ठहर जाता हूँ
एक आवाज़ है जो मुझे रोक लेती है

कभी क़दम बढ़ता है शहर कि तरफ
मगर तभी या ख्याल आता है
वहां भी कौन सा कोई आबाद है
उस शहर से तो ये जंगल ही शाद है
जानवर यहाँ  भी यही वहां भी
जान ये लेंगे तो मारेंगे वहां भी
यहाँ भी वहशत है, वहाँ भी
खून ओ गारत यहाँ  है, वहाँ भी
मगर यहाँ एक सब्र तो है
मारने वाला जानवर है, वहशी इंसान नहीं
ये तो फिर भी इतना लिहाज़ करता है
सामने देखकर रास्ता बदलता है
मगर वो मेरे ही रास्ते पर आता है
भाई कहकर गले भी लगाता है
और फिर चुपके से मौक़ा पाकर
मेरी पीठ में मेरे ही खंजर से
एक प्यार भरा वार लगाता  है

अब बता ऐ मेरे दिल
क्या मै घर चला जाऊँ

उस आवाज़ को अनसुना कर जाऊँ
जो मुझे शहर कि तरफ जाने से रोकती है.

Wednesday, October 7, 2009

मेरे मन मेरे हमसफ़र

मेरे मन मेरे हमसफ़र
एक तू ही तो है
जो जानता है कौन हूँ मैं...
चल कोई और नहीं है मेरा
तो क्यों ना मैं तुझ से ही कुछ बोलूं
इस दिल के अनसुलझे राज़ कुछ खोलूं
या यूँ करूँ के खामोश ही रहूँ
जैसे अब तक करता आया हूँ
तुझे तो मालूम है कुछ  बोलने का अंजाम
इस दौर ए बेजुनु में लब खोलने का अंजाम
मै अगर खामोश रहा तो
शायद किसी को कुछ खबर ना हो
कहीं कोई हलचल ही ना हो
मै अगर लब खोलूँगा
तो शायद मुझे ही मुश्किल होगी
ना कहीं कोई हलचल होगी
ना ही किसी को कोई आफत होगी
सब ही तो जानते हैं
मेरे पास कहने को रखा  क्या है?
दुनिया में गर बुरा है तो नया क्या है?
हर कोई तो हमाम में नंगा है
दिल चंगा तो कठौती में गंगा है
सब ही को तो बुरे में मज़ा आता है
एक तू ही है जो खामख्वाह बिलबिलाता है
जा जो हो रहा है होने दे
तुझे किसी से क्या?
तू तो मेरा हमसफ़र है ना
मेरी तरह ही खामोश रह
लब ना खोल
जो रहा है होने दे
इसी में हम दोनों का भला है.

Monday, September 14, 2009

मैं कौन हूँ?


मज़हब हमें जीना सिखाता है मगर हम मज़हब के लिए मर भी जाते है। मज़हब हमें अच्छा बनने का सबक देता है और हम मज़हब के नाम पर तमाम बुराइयाँ पैदा करते हैं। इस के नाम पर हम उंची नीची दीवारें बनाना और गिराना भी सीखते हैं। मगर मै हमेशा से ही मज़हब को लेकर बड़ा पशोपेश में रहता हूँ।
मेरा मज़हब क्या है? हिंदू? हो भी सकता है। मेरा जन्म हिंदुस्तान में हुआ। इस नाते मुझे लोग हिंदू बुला सकते हैं। मेरे हिंदू होने की दो चार वजह और भी हो सकती हैं। मेरे घर के सामने एक मन्दिर है। यहाँ रोजाना लाउड स्पीकर पर फिल्मी गीतों पर आधारित भजन बजाने का चलन है। कुछ मुझे भी याद हो गए हैं। इन्हे सुनकर मेरे दोस्त मुझे हिंदू मान लेते हैं। मेरे पिताजी रामचरितमानस के अच्छे वाचक थे। मुझे याद है उन्हें अक्सर अखंड पाठ में भाग लेने के लिए बुलावे आते थे। हालाँकि इस विधा में मेरा हाथ तंग है। हाँ, मन्दिर में विभिन्न अवसरों पर दिए जाने वाले भोज में मई हिस्सा लेता रहा हूँ। इतने सब के बाद भी शायद मै हिंदू नही हूँ।
मै मुसलमान भी हो सकता हूँ। मेरा नाम तो मुझे मुसलमान ही मानता है। मेरे आसपास के लोग भी। मेरे मुसलमान होने की कई वजह हैं। मेरे पिताजी मुसलमान थे शायद इसलिए, या फ़िर मेरा परिवार मुसलमान है या शायद मै मुसलमान दिखता हूँ। पता नही मगर किस लिए ?
मै नमाज़ पढता हूँ। मगर मुझे याद है मै तो चर्च भी जाता था। हालाँकि एक अरसा गुज़र गया वहां दोबारा गए। मगर मस्जिद भी तो रोजाना नही जाता। मन्दिर भी ना जाता , अगर वो मेरे घर से सामने ना होता। हाँ गुरुद्वारे तक भी अक्सर पाँव चले जाते हैं। चले क्या जाते हैं, मेरे दोस्त ले जाते हैं, जैसे कुछ मुझे मस्जिद की सैर करा लाते हैं। मगर इन सब से तो उलझन और बढ़ जाती है। मै ही क्या , हर कोई मेरे मज़हब को लेकर उलझन में पड़ जाएगा। सवाल ज्यों का त्यों रहा।
क्या मज़हब को मानना ज़रूरी है? हाँ क्यों नही! मज़हब ही तो हमें इंसान बनाता है। जो हैवान बनते हैं वो मज़हब को मानते ही कब हैं? अगर मानते हैं तो फिर शैतान भी ग़लत कहाँ। स्वर्ग से निकाले जाने से पहले वो भी तो सुबह शाम सजदों में सर पटका करता था। तो क्या हम सब शैतान को तो नही मान रहे? नही ?
जाने दो इस उलझन को। फ़िर एक बार मज़हब के नाम पर अपने आप को उलझाने का कोई फायदा नही। यूँ करते हैं के दुनिया के सब से पुराने मज़हब को मान लेते हैं। हम सब आखिर हैं तो इंसान ही , फिर इंसानियत से ये गुरेज़ कैसा?

Saturday, September 12, 2009

मेरी माँ , मेरी दुनिया...


घर चारदीवारों से घिरा एक आसरा भर नही मगर अपने आप में मुकम्मल दुनिया है। इन दीवारों के पीछे एक अजब सी अनुभूति होती है आज़ादी की । आज़ादी अपने आप को जीने की। भले ही यहाँ की बंदिशें कभी कभी व्याकुल ज़रूर करती हैं मगर इन बंदिशों के बाहर का संसार ज़्यादा भयावह नज़र आता है। ये बंदिशें इतनी क्रूर नही कि तुमसे जीने का हक ही छीन लें। वरन इन बंदिशों में जो स्नेह, जो मर्म छिपा है उसका उस खुली दुनिया में कोई सानी नही । खुले आसमान के नीचे एक अजीब सा डर मुझे घेर लेता है। लगता है आकाश से कोई बला आकर मुझे झपट ले जाएगी।
घर के भीतर एक काया है जो मेरे इंतज़ार में रात दिन एक किए रहती है। उसे इस दुनिया से मुझसे कहीं ज़्यादा डर है। उसे लगता है कोई मुझे झपट ले जाएगा, उस से कहीं दूर। मै घर से निकल आता हैं तो यह काया बेचैन सी इधर उधर डोलती है। इंतज़ार करती है मेरे सकुशल लौटने का। मेरी फ़िक्र में शायद दिन भर भूखी भी रहती है । तभी तो चेहरे से बीमार सी नज़र आती है। ये मेरी माँ है जो उम्र से पहले ही बूढी सी नज़र आती है।
आजकल तो मुझे लेकर रंग बिरंगे सपने भी बुनती है, बशर्ते मै घर से कहीं दूर न होऊं। उसे इस घर में एक और काया का इंतज़ार है। जिस तरह वो इस चारदीवारी में आकर बरसों पहले क़ैद हो गई थी, ठीक उसी इतिहास को मेरी माँ दोहराना चाहती है। मगर वो शायद नही जानती के करीब में बहने वाली गंगा से इन बरसों में काफ़ी पानी बह चुका है। जब वो गंगा पार कर मेरे घर की चारदीवारी के भीतर आई थी तब रिश्तों में एक मर्म था। तब डार्विनवाद अपने चर्म पर नही था। अब तो एक गलाकाट है एक दूसरे से आगे निकलने की। दुनिया में वही बचेगा जो दूसरों को रौंदकर आगे बढ़ जाएगा। इस गलाकाट में रिश्तों का कोई महत्व नही।
उसका डर ठीक ही तो है इस दुनिया को लेकर। घर से निकल कर वापस महफूज़ घर लौट पाना आज कल सभी को तो नसीब नही होता। उसकी चिंताएँ एक हद में क़ैद हैं, आखिर उसकी एक छोटी सी दुनिया है जो बहुत हद तक मेरे आसपास आकर ख़त्म हो जाती है। उस हद के बाहर के खतरों का उसे अहसास भी हो जाए तो शायद मै उस चारदीवारी से निकल ना पाऊं जिसे हम घर कहते हैं।
उसके डर के बावजूद मै घर से निकलता हूँ। कई रोज़ तक वापस ना लौटने के लिए। इस दुनिया में भटकता हूँ जो शायद जंगल से भी खतरनाक है; जहाँ जंगल कि तरह कानून का पालन भी नही किया जाता। और मेरी माँ मेरे आने के इंतज़ार में सो जाती है, मेरे लौट आने की आरजू लेकर। एक जाने पहचाने डर और एक अनजाने से दर्द के साथ।

Thursday, September 10, 2009

मील का पत्थर


इंसान मंजिलों से गुज़रता जाता है और राहे पीछे छूटती जाती हैं . शायद ही कोई होगा जिसे मील के पत्थर से प्यार हो. कोई मील के पत्थर के साथ गलबहियां करने की हिमाक़त नहीं करता . फिर भी जाने क्यों मेरा दिल मील के हर पत्थर के साथ उलझता है. वो मेरी ज़िन्दगी का सरमाया न सही मगर मेरी ज़िन्दगी उसके करीब से होकर गुजरी तो है.
      जाने कितने लोग मेरे करीब से होकर गुज़रे होंगे. उनमे से कुछ तो यूँ ही बस और कुछ की अहमियत किसी मील के पत्थर से कम भी नहीं. ज़िन्दगी अपनी रवानी से बहती चली जाती है. आखिर यही तो जीवन है. कभी कभी दिल में ख्याल उठता है के क्या जीवन सिर्फ चलते जाना ही है? सफ़र में हम रुक कर ठहर कर सांस भी तो लेते हैं. आराम करने भर की मोहलत तो सफ़र में मिलनी ही चाहिए ना ? दिल इस बात पर राज़ी हो भी जाता है मगर दूसरों से पीछे रह जाने का खौफ कहिये या फिर सब से आगे निकलने की चाह . सांस ले भी नहीं पाता के फिर चलना पड़ता है. चलना भी क्या रुकने के बाद तो नौबत दौड़ लगाने की भी आ जाती है.
     दिल में मंजिल  तक पहुँचने की उमंग उठती रहती हैं और सफ़र लगभग ना रुकने और ना थमने वाले अंदाज़ में जारी रहता है. इस बीच किसी मील के पत्थर पर ठहरकर सांस लेने की कोशिश करता हूँ. इस अल्पविराम के दौरान दिल की धड़कने तेज़ होती हैं सो  दिमाग  पर ही सारा बोझ आ जाता है.अब दिमाग सोचता है तो दिल और ज्यादा बेचैन हो जाता है.
       ज़िन्दगी सफ़र है मगर ये गलाकाट किस के लिए? क्या दूसरों से आगे निकलने के लिए नीचे गिर गए लोगो को रौंदते हुए निकल जाना बेहतर है? या फिर ऊंचाई तक पहुँचने के लिए किसी के सर पर पैर रखना ज़िन्दगी का अनिवार्य नियम है?
      सफ़र को तो जारी रखना ही है. तमाम झंझावातों क सहते हुए कहीं दूर निकल जाना है. दूर इतना के वापसी भी मुमकिन ना हो. मगर ये इंसानियत को रौंदते हुए जाना कहाँ की तुक है? अगर किसी को कुचल कर ही जाना है तो क्यों ना मै अपनी राह ही बदल दूँ? या फिर जगह बनाते हुए निकल जाऊं जिस से कोई मेरे कदमो तले ना आये ? या फिर अपने प्यारे मिल के पत्थर के गले में बाहें दाल कर बैठ जाऊँ ? कभी आगे ना जाने के लिए ?

Wednesday, September 9, 2009

जहाज़ का पंछी


जब कराची में समुन्दर के साहिल पर खिंची गई एक तस्वीर पर लिखे एक शेर में मशहूर पाकिस्तानी शायर जौन एलिया कहते हैं , " इस समुन्दर पे आकर भी तश्नाकाम हूँ मैं, बान तुम अब भी बह रही हो क्या?" तो अपनी मिटटी से बिछड़ने का दर्द अपने चरम पर होता है। कराची में समुंदर की आसमान छूती लहरों में उनकी प्यास बुझाने के ताक़त नही क्योंकि जौन उस बान नदी की ओस से प्यास बुझाना चाहते थे जो ख़ुद अपनी प्यास में लाकर एक गंदे नाले से ज्यादा नही रह गई थी। मगर वो उनके लिए महत्वपूर्ण थी क्यों की वो वो उनसे हजारों मील दूर उनके वतन में बह रही थी जो मुल्क के बंटवारे में उन से दूर हो गया था। ये अहसास उन लाखों दिलों में हर वक्त मौजूद है जो किसी न किसी वजह से अपने घर से दूर हैं।
कहते हैं की घर की खुशबु हर वक्त हर लम्हा हमें आवाज़ देती रहती है। खुशकिस्मत लोग उसे सुन लेते हैं और जवाब देने की हालत में होते हैं। बदनसीब उसे सुन कर भी अनसुना कर देते हैं और कुछ मजबूर चाह कर भी कुछ कर नही पाते। मेरे साथ इन सब में से तो कुछ बात नही मगर ना जाने क्यों घर से जाने के नाम पर ही मेरी जान सूखने लगती है। मुझे एक और शेर याद आता है जिसमे शायर कहता है " घर की वहशत से ही दिल मेरा लरजता है, मगर शाम होती है तो घर जाने को जी चाहता है। "
मेरी ज़िन्दगी जिस जगह से शुरू होती है उसी जगह जाकर थम सी जाती। मई हर रोज़ नया सफर शुरू करता हूँ। दुनिया के सामने कांपता, लरजता निकलता हूँ अपनी दुनिया की तलाश में मगर फिर ना जाने क्यों शाम से पहले ही वापस लौट आता हूँ। मेरी मंजिल क्या है, ख़ुद मुझे भी शायद नही मालूम। एक बात जो बस दिल में रहती है, वो है की मै किसी कीड़े मकोड़े की मौत नही मरना चाहता। मै चाहता हूँ के जब दुनिया से मेरा आखिरी सफर शुरू हो तो मेरे पास इस सफर के लिए ज़रूरी समान तो हो ही मगर अपने पीछे रोती बिलखती दुनिया को देने के लिए चंद मुस्कुराहटें भी हों।
मेरा न ख़त्म होने वाला सफर शाम होने से पहले ही थक जाता है। मेरी ज़मीन की आवाज़ मुझे हर शाम अपने घर लौटा लाती है। मै जिस जहाज़ पर हूँ उसके साहिल पर पहुँचने का भरोसा शायद ही किसी को हो मगर मेरा जहाज़ ही मेरा घर है और मै उस जहाज़ का पंछी...

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